Posted by : Ashutosh Garg Saturday, 14 December 2013

By - Arya Ashutosh Garg
यदि पृथ्वी पर ऐसा कोई देश है, जिसे हम धन्य पुण्य भूमि कह सकते है, कोई ऐसा स्थान है जहाँ पृथ्वी के सभी जीवों को अपना कर्म फल भोगने के लिए आना पडता है, यदि कोई स्थान है जहाँ ईश्वर की ओर उन्मुख होने के प्रयत्न में संलग्न रहने वाले जीव मात्र को अंततः आना होगा, यदि कोई ऐसा देश है जहाँ मानव जाती की क्षमा, धृति, दया, शुद्धता आदि सद्वृतियो का सर्वाधिक विकास हुआ है और यदि कोई ऐसा देश है जहाँ अध्यात्मिकता तथा आत्मान्वेषण का सर्वाधिक विकास हुआ है तो वह अपना देश भारत ही है| अत्यंत प्राचीनकाल से ही यहाँ
विभिन्न महापुरुषों ने जन्म लेकर सारे संसार को सत्य की अध्यात्मिक, सनातन, और पवित्र धरा से बारम्बार प्लावित किया है| यहीं से सभी दिशाओं में दार्शनिक ज्ञान की प्रबल धराए प्रवाहित हुईं है, और यही से वो धारा बहेगी, जो आज कल की पार्थिव सभ्यता को आध्यात्मिक जीवन प्रदान करेगी| विदेश के लाखों स्त्री पुरुषों के ह्रदय में (और उसके प्रभाव में अब तो भारत में भी) जो भौतिकवाद की अग्नि धधक रही है, उसे बुझाने के लिए जिस जीवन दायिनी सलिला की आवश्यकता है, वो यही विद्यमान है. मित्रो विश्वास रखो यही होने जा रहा है|
यदि विभिन्न देशो के इतिहास का अध्ययन किया जाये, और उनका पारस्परिक अध्ययन किया जाये तो ये पता करना ज्यादा कठिन नहीं है कि है की सारा संसार हमारे देश का अत्यंत ऋणी है| यह ठीक है की अनान्य स्थानों में भी सभ्यता का विकास हुआ है, प्राचीन कल से ही कितनी ही अन्य जातियों ने भी उच्च भावो को जन्म दिया है, और महान शक्तिशाली सत्य के बीजो को चारो ओर बिखेरा है. परन्तु आप ये भी आसानी से पता कर सकते है कि अन्य सभ्यताओ में अच्छाई का सम्बन्ध भी कही न कही भारत से ही है.
और उन महान सत्य के प्रचार के तरीके में अंतर को देख और समझ के तो और तुम अपने भारत से प्रेम करने लगोगे. एक ओर जहा अन्य देशो ने अपने सत्य के प्रचार के लिए रण भेरी के निर्घोष तथा रण सज्जा से सज्जित सेना समूह का प्रयोग किया है. उनका कोई भाव बिना रक्त प्रवाह में सिक्त किये, बिना लाखो स्त्री – पुरुषों के खून की नदी में स्नान किये नहीं बढ़ा| प्रत्येक ओजस्वी भाव के साथ ही साथ असंख्य लोगो का हाहाकार, अनाथो और असहायों का करुण क्रंदन और विधवाओ का अजस्त्र अश्रुपात होते देख गया. परन्तु दूसरी ओर भारत ने इन उपायों के अवलंबन के बिना ही हजारो वर्षो से शन्तिपूर्ण तरीके से विश्व के उन्नति में योगदान देता रहा|
जब यूनान का अस्तित्व नहीं था, रोम भविष्य के अंधकार गर्भ में छुपा था. आधुनिक यूरोपियो के पुरखे घने जंगलो के अन्दर छुपे रहते थे, और अपने शरीर के नील रंग से रँगा करते थे, तब भी भारत क्रिया शील था और उस समय भी था जिस सुदूर धुंधले अतीत की ओर झाँकने का साहस इतिहास भी नहीं कर पाता और वही भारत आज भी क्रियाशील है. उस कल से आज तक भारत ने पता नहीं कितनी बार बाहर के लोगो को शिक्षा दी परन्तु प्रत्येक शब्द के आगे शांति और पीछे आशीर्वाद ही रहा| संसार के सभी देशो में केवल हमने किसी अन्य पर आक्रमण/ अत्याचार नहीं किया, और इसी आशीर्वाद से हम जीवित है. आज जबकि रोम युनान ईरान सभी नष्ट हो गए, हम उनसे पहले भी थे और बाद भी है. पूर्व प्रधान मंत्री कवि अटल बिहारी वाजपेई जी ने इसे निम्न पंक्तियों में उद्धृत किया है.
दुनिया का इतिहास पूछता रोम कहाँ यूनान कहाँ है,
घर – घर में शुभ अग्नि जलाता वह उन्नत ईरान कहाँ है|
दीप बुझे पश्चिमी जगत के, व्याप्त हुआ बर्बर अँधियारा,
किन्तु चीर कर तम की छाती चमका हिन्दुस्थान हमारा||

मित्रो हमारे इतने विपरीत परिस्थितियों में भी जीवित रहने का कारण यदि मुझे समझ आता है तो वो हमारा अध्यात्म है, आप किसी और मत की पुस्तकों को देखे वहां किसी प्रकार का विज्ञान नहीं है. यहाँ हमने वेद को इश्वर के द्वारा प्राप्त करने के बाद मानवोपयोगी आयुर्वेद आदि ग्रंथो की रचना की| हमारे यहाँ अन्वेषण हमेशा से बहुत उच्च कार्य समझा जाता रहा है| इसी कारण से हमारे यहाँ का प्राचीन विज्ञानं बहुत ही बड़े स्तर का था. यहाँ ये बात द्रष्टव्य है की हमारा मत कभी विज्ञान के विकास के बिच नहीं आया. यदि हम अपने पुराने अन्वेशको को देखे तो वे बड़े धार्मिक व्यक्ति हुआ करते थे. अब कही न कही इन यूरोपीय भौतिकतावादी सोच के कारण हम आध्यात्म से दूर होते जा रहे है. लोग ये सोचते है की हम इससे प्रगति कर रहे है परन्तु मित्रो ऐसे समय में मुझे स्वामी विवेकानंद जी का एक विचार याद आ रहा है जिसमे उन्होंने कहा की भारत का मुख्य केंद्र अध्यात्म है, यदि इससे अलग इसका कोई केंद बनाने का प्रयास हुआ तो देश का अस्तित्व खतरे में आ जायेगा. जी हा यदि हमें विकास करना है तो हमें अध्यात्म के केंद्र में ही करना होगा. और इसे हमने करके दिखाया है, भूतकाल में. उस समय हम विश्वगुरु थे आज लोगो के पीछे चलना होता है. कारण क्या है यदि हम अपने विकास और अध्यात्म में संतुलन बनाये तो भारत फिर से विश्वगुरु बन सकता है. एक तरफ आज की तथाकथित पढ़ी लिखी युवा पीढ़ी है जो धर्म को समाप्त करने पर तुली है, और दूसरी ओर धर्म के ठेके दार| हमें मिलकर इनकी दुरी को पाटना है. यही हमारा लक्ष्य होना चाहिए. इसी कार्य पर भारत के आगे का इतिहास निर्भर है. आओ भारत माता की सेवा में हम अपना जीवन अर्पण कर दे.
भारत माता की जय, वन्दे मातरम् |    

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