Posted by : Ashutosh Garg
Saturday, 4 January 2014
आज सीरिया बर्बादी के कगार
पर आ चूका है, इसकी स्थिति सरकार के वश से बाहर जा चूकी है| इसके बर्बादी की शुरुआत
मार्च २०११ में हुई जब तानाशाही के विरोध में किया गया प्रदर्शन हिंसक और सशस्त्र
क्रांति में परिवर्तित हो गया. ये प्रदर्शन “अरब स्प्रिंग” नामक आन्दोलन का एक
हिस्सा था. सीरिया के नागरिक असद के तानाशाही शासन के विरोध में खड़े हुए और
लोकतंत्र की मांग की. कट्टरवादी संगठन मुस्लिम “ब्रदरहुड” इस अवसर का लाभ उठा कर
सीरिया को एक ऐसा राष्ट्र बनाने के प्रयास में लग गए जो इस्लामी शरिया कानून
द्वारा शासित हो. इसका प्रयास वे सीरिया के स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही कर
रहे थे. कट्टरवादी संगठनो के शामिल होने से इस आन्दोलन ने साम्प्रदाइक रंग पकड़
लिया.
सिरिया की वर्त्तमान
परिस्थितियों के बीज भुतकाल में घटे कुछ घटनाओ के गर्भ में छुपे हुए है. सीरिया की
जनसँख्या में 74% सुन्नी मुस्लमान 12% alawites और 10 % इसाई है.
alawites मुस्लिमो के शिया सम्प्रदाय से स्फुरित हुआ एक अन्य संप्रदाय है.
alawites को सुन्नी मसलमानों के द्वारा लम्बे समय तक प्रताड़ित किया गया है. इनकी प्रताड़ना
का इतिहास तुर्क साम्राज्य के समय से है,
जब उनको सुन्नी में मतान्तरित होने के लिए बाध्य किया गया.
सुन्नी मुसलमानों और
alawites के बीच का संघर्षपूर्ण इतिहास आज भी सीरिया के वर्तमान घटनाओं को प्रभावित
करता है. सीरिया के नायक सलाद्दीन ने भी अपने शासनकाल में शिया मुसलमानों को
प्रताड़ित किया| अल्पसंख्यक alawites एक आसान निशाना थे.
विश्व में सभी स्थानों पर
alawites को कट्टरवादियों द्वारा दमन का शिकार होना पड़ा. सबसे प्रशिद्ध घटना
त्रिपोली (लीबिया) में घटित हुई जब एक मुस्लिम विद्वान ने एक फतवा जारी करते हुए,
इस्लाम के विधर्मी सम्प्रदायों की भर्त्सना की. उसने विशेष रूप से alawites को
उल्लेखित करते हुए लिखा कि ये ईसाईयों से भी अधिक विधर्मी हैं. इसके कारण alawites
को बड़े पैमाने पर प्रताड़ित किया गया और उनकी हत्या की गयी. एक आकलन के अनुसार उस
समय 20,000 से अधिक alawites की हत्या की गयी. उनको सभी अधिकारों से वंचित रक्खा गया, और
वे पहाड़ो पर जीवन व्यतीत करने को विवश हो गए. ऐसी स्थिति में सीरिया कोई अपवाद
नहीं था.
जब फ्रांसीसियों ने सीरिया
को अपना उपनिवेश बनाया तो उन्होंने इस फूट का लाभ उठाया. उन्होंने सुन्नी
राष्ट्रवादीयों के प्रभाव को कम करने हेतु alawites को राजनितिक एवं सामाजिक
अधिकार दिए| इन अधिकारों को पाने के बाद alawites फ्रांसीसियों के विश्वासपात्र बन
गए. जब फ्रांसीसी सीरिया को छोड़कर जा रहे थे तो सुन्नी और alawites के बीच सत्ता
का संघर्ष हुआ. स्वतंत्रता के बाद की राजनीति में सुन्नी मुसलमानों का प्रभुत्व
रहा. बहुत से सुन्नी संगठन सीरिया को इस्लामी राष्ट्र बनाना चाहते थे.
अल्पसंख्यकों ने इसका विरोध
किया, उनमे से एक युवा alawite हाफ़िज़- अल – असद भी था, जो सीरिया को एक
मतनिरपेक्ष (Secular) राष्ट्र बनाना चाहता था.
उसने सैन्य तख्तापलट द्वारा 1970 में सत्ता हासिल की. सीरिया का एक आम गरीब मनुष्य उसका शासक
बन गया. उसने सीरिया को मतनिरपेक्ष राष्ट्र बनाया, और अल्पसंख्यको के अधिकारों की
रक्षा की. परन्तु उसने एक तानाशाह की तरह राज किया और सीरिया को एक सैन्यराष्ट्र
बना दिया.
“मुस्लिम ब्रदरहुड” ये
बर्दाश्त नहीं कर पाई कि एक alawite (जिसे वे विधर्मी समझते थे) 70% सुन्नी मुसलमानों पर शासन करें. वे असद द्वारा शुरू किये
गए मत निरपेक्ष राष्ट्र के विरोध में थे. उन्होंने विरोध के उस तरीके को अपनाया जो
आज के मुस्लिम अतंकवादियो द्वारा प्रयोग किया जाता है. उन्होंने 6 वर्षीय आतंक
अभियान चलाया जो सत्तर के दशक के अंत से अस्सी के दशक के शुरुआत तक चला. व्यापक बम
धमाको, और निष्पादन के उस दौर में कई राजनीतिज्ञो और विद्वानों सहित हजारो नागरिको
की हत्या हुई. डमस्कस में हुए एक बम धमाके में alawites के कई जवानों की मृत्यु हो
गयी. असद पर भी कई जानलेवा हमले हुए.
अब असद ने भी अपने पुरे
ताकत और क्रूरता से इस आन्दोलन के दमन की शुरुआत की. सरकार की ओर से व्यापक
गिरफ्तारियाँ और निष्पादन किया गया. हामा नामक सीरिया का एक प्राचीन नगर जो
“मुस्लिम ब्रदरहुड” का गढ़ माना जाता था, उसे कड़ाई से दबाया गया. सरकार द्वारा
फरबरी 1982 में हामा पर किये गये हमले में सभी विद्रोहियों एवं कई नागरिको की मृत्यु हुई.
सभी हताहतों की संख्या 10,000 से ज्यादा बताई गयी. इस घटना के बाद “मुस्लिम ब्रदरहुड” की
हालत पस्त हो गयी.
हाफिज – अल – असद के समय
में अधूरे रह गये मकसद को वे (मुस्लिम ब्रदरहुड) अब पूरा करना चाहते है. इसके लिए वे अल –
नुसरा फ्रंट (जो सीरिया में अलकाईदा की एक शाखा है) से जुड़ गएँ हैं. विद्रोहियों
और सरकार दोनों को जो बाह्य समर्थन मिल रहा है वो सम्प्रदाईक हितों से जुड़ा हुआ
है. हेज्बुलाह और ईरान सरकार का समर्थन कर रहे है, वहीँ अल - काईदा और अरब
विद्रोहियों का समर्थन कर रहे है. जो प्रदर्शनकारी वास्तव में प्रजातंत्र की मांग
कर रहे है, इन सम्प्रदाईक दंगो के बीच पिस कर रह गए हैं. विद्रोहियों का नेतृत्व
पूर्ण रूप से कट्टरवादियो के कमान में है. हो सकता है कि सीरिया असद के शासन में
अच्छा ना हो, परन्तु कट्टरपंथियों के शासन में इससे अच्छा होने की कोई सम्भावना
नहीं है. सीरिया को अफगानिस्तान के इतिहास से सबक लेते हुए, कट्टरपंथियों को हावी
होने से रोकना चाहिए.
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